कैंसर जैसी जानलेवा बीमारियों को दावत दे रहा है पेस्टिसाइड्स
October 6, 2019 • Ramswaroop Mantri





 माेबाइल से ज्यादा खतरनाक पेस्टीसाइड

  • एमएन बुच मेमोरियल लेक्चर ईकोलॉजी इज फॉर पीपुल विषय पर बोले डॉ. गाडगिल

 

भोपाल .आज के दौर में मोबाइल से ज्यादा खतरनाक पेस्टीसाइड है। इंसानों में यह न सिर्फ कैंसर और गंभीर बीमारियों का कारण है बल्कि यह समान रूप से पशु-पक्षियों के लिए भी हानिकारक है। यही वजह है कि बहुत से पक्षी नजर आना भी बंद हो गए हैं। खास बात यह है कि सरकार के पास ऐेसे कानून हैं जो पारिस्थितिकी तंत्र को बिगाड़ने वाली अवैध गतिविधियों को रोक सकें, लेकिन सरकार तो स्वयं ऐसी गतिविधियों को बढ़ावा दे रही है।

पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने वाली गतिविधियों को राेकने में सरकार सख्त नहीं है। एनजीटी की कौन सुन रहा है, कानून बनें है पर उसका पालन नहीं हो रहा। यह बात वरिष्ठ वैज्ञानिक और इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस के पूर्व प्रोफेसर डॉ. माधव गाडगिल ने कही। वे शनिवार को समन्वय भवन में आयोजित पंाचवें महेश बुच स्मृति व्याख्यानमाला के तहत ईकोलॉजी इज फॉर पीपुल विषय पर अपने विचार व्यक्त कर रहे थे।

जैसे-जैसे विकास हुआ पारिस्थितिकी तंत्र बिगड़ा :उन्होंने कहा कि पेस्टीसाइड का असर तो समान रूप से सभी पर पड़ता है। इसकी मुख्य वजह है कि सभी जीव प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से फसलों में उपयोग होेने वाले पेस्टीसाइड से संपर्क में हैं। डाॅ. गाडगिल ने कहा कि जैसे-जैसे मानव सभ्यता का विकास हुआ पारिस्थितिक तंत्र पर इसका असर पड़ा। उन्होंने बताया कि गौतम बुद्ध ने कहा था कि लालच दुखों की जड़ है, महात्मा गांधी ने कहा था कि प्रकृति मानव की जरूरत को तो पूरा कर सकती है पर लालच को नहीं। आज ऐसा ही हो रहा है। िवकास के नाम पर प्रकृति से खिलवाड़ किया जा रहा है। ग्लोबल वार्मिंग, जंगलों को काटकर बनाए जा रहे कांक्रीट के जंगल बिगड़ते पारिस्थितिकी तंत्र की प्रमुख वजह है। उन्हांेंने बताया कि एशिया में भूटान सबसे खुशहाल देशों में से एक है। इसकी मुख्य वजह यह है कि यहां प्रकृति से छेड़छाड़ नहीं की गई। उन्होंने एक उदाहरण दिया कि सैकड़ों साल पहले मिस्त्र में हजारों मजदूरों से फराओ के लिए पिरामिड बनवाए गए ताकि वे मृत्यु के बाद खुश रह सकें।

भारी बारिश और बाढ़ की वजह ग्लोबल वार्मिंग... डाॅ. गाडगिल ने व्याख्यान के बाद भास्कर से कहा कि देश में अति बारिश और बाढ़ की प्रमुख वजह ग्लाेबल वार्मिंग है। उन्होंने चेतावनी दी कि आने वाले समय में ऐसी घटनाएं और बढ़ सकती हैं। उन्हांंेने बताया कि वाहनों और फैक्ट्रियों के धुएं से ऐरोसोल की लेयर बन जाती है। इस वजह से जो पानी छह घंटे में बरसना चाहिए वह कुछ देर में बरस जाता है। कार्यक्रम में रेरा के अध्यक्ष अंटोनी डिसा ने कहा कि ईको का मतलब होम होता है। प्रकृति ने मानव को सब कुछ दिया है। इससे लगातार छेड़छाड़ की वजह से दुष्परिणाम सामने हैं। अगर अब भी सचेत नहीं हुए तो इसके गंभीर परिणाम होंगे।