डराने लगा मुंबई का समुद्र मछलियों की जगह प्लास्टिक का समंदर बना
September 9, 2019 • एग्रो इंडिया

2050 तक मुंबई के समुद्र में मछलियों से ज़्यादा प्लास्टिक तैरता दिखाई देगाः रिपोर्ट

मुंबईः कहते है की समंदर अपने पास कुछ नहीं रखता है, आप उसमे जो कुछ डालेंगे वो आपको वापस कर देगा . इतने सालो तक जो कचरा प्लास्टिक की शक्ल में हम समंदर को देते आये है अब आने वाले वक्त में उसकी कीमत हमें और हमारी आने वाली पीढ़ियों को ही चुकानी होगी . चर्चा तो पहले से ही है लेकिन अब आईआईटी बॉम्बे (IIT Bombay) के एक प्रोफेसर की रिसर्च ने इस डर पर मुहर भी लगा दी है.

ये रिसर्च बताती है की समुद्र में जमा हो रहे प्लास्टिक की वजह से ना केवल समुद्रीय जलिय जीवन को खतरा पैदा हो गया है बल्कि आने वाले वक्त में इसके बेहद खतरनाक परिणाम पर्यावरण को भी झेलने होंगे, इसके साथ ही इसके विपरीत परिणाम फ़ूड चैन में आये बदलाव की वजह से मनुष्यो के लिए भी बेहद बुरे साबित होने वाले है .

समुद्र के किनारे पर आया हुआ ये प्लास्टिक आपको महज कचरा लग रहा होगा लेकिन ये भविष्य का वो खतरा है जिसे हमारी आने वाली पीढ़ी को झेलना पड़ेगा . आईआईटी बॉम्बे के सिविल इंजीनियरिंग डिपार्टमेंट के प्रोफेसर रंजीत विष्णुराधन और डिपार्टमेंट के हेड टी आई एल्डो ने कड़ी रिसर्च और मेहनत के बाद अपनी रिपोर्ट दी है.

ये रिपोर्ट अपने आप एक अलार्म है हम सबके लिए . दूसरे विश्व युद्ध के बाद 1950 के आगे के सालो में प्लास्टिक का उपयोग दुनिया में तेजी से बढ़ा है . 1950 में जहा ग्लोबल प्लास्टिक का उत्पादन सिर्फ 1.5 मिलियन मैट्रिक टन था वही 2018 आते आते ये उत्पादन 350 मिलियन मैट्रिक टन हो गया है और इस 350 मिलियन मैट्रिक टन का भी आधा प्लास्टिक पिछले 10 सालो में उत्पादित किया गया है . एक बार उपयोग में लाये जाने के बाद इनमे से आधा प्लास्टिक हमारी नज़रो के सामने से गायब हो जाता है लेकिन अब सवाल उठता है की ये आखिर जाता कहा है ? इसी प्लास्टिक को समुद्र में डाल दिया जाता है

एक रिपोर्ट कहती है की अगर ठीक इसी स्तर पर हम हर साल प्लास्टिक का इस्तेमाल करते रहे तो साल 2050 तक समुद्र में मछलियों से ज़्यादा प्लास्टिक तैरता दिखाई देगा .

ओसियन प्रोसेस 
Ocean प्रोसेस का मुख्य ड्राइवर सूरज को माना जाता है . ओसियन करंट्स (Ocean currents) के मूवमेंट्स की बात हो या समुद्र के सतह के ठीक नीचे के जीवन की, इन्हें सूरज से मिलने वाली ऊष्मा अमृत के समान है . यही दुनिया में मौजूद फ़ूड चैन का भी बेसिक्स होता है . जब सूरज की किरणे प्लास्टिक की वजह से समुद्र की निचली सतह पर नहीं जा पाती है तो जमीन से जुड़ा ocean process पर असर पड़ता है. समुद्र में जाने वाले टोटल कचरे का 80% कचरा प्लास्टिक का होता है . ये रिपोर्ट इस बात पर भी ज़ोर दे रही है की समुद्र में बढ़ते इस प्लॉस्टिक पॉलुशन की वजह से करीब 700 मरीन स्पीशीज के आस्तितव पर ही खतरे के बादल मंडराने लगे है .

पर्यावरण पर प्रभाव 
रिपोर्ट बताती है की कुल प्लास्टिक उत्पादन का 50% हिस्सा सिंगल यूज़ प्लास्टिक का होता है जिसमे low density Polyethylene, high density Polyethylene, PP, Polystyrene और PET का होता है . इनमे मौजूद मीथेन और ईथीलीन सोलर रेडिएशन की वजह से ग्रीन हाउस गैसेस का पैदा करती है जिससे आने वाले सालो में पर्यावरण पर बेहद विपरीत असर देखने के लिए मिलेंगे .

मानव जाति पर प्रभाव
प्लास्टिक के बड़े और छोटे टुकड़े समुद्र की सतह पर आपस में रगड़ते है जिससे उनके मैक्रो प्लास्टिक के टुकड़े, उनसे छोटे माइक्रो प्लास्टिक के टुकड़े और सबसे सूक्ष्म नैनो प्लास्टिक के टुकड़े बन जाते है . मैक्रो प्लास्टिक को तो आप अपनी आखो से देख भी सकते है लेकिन माइक्रो प्लास्टिक और  नैनो प्लास्टिक के टुकड़े तो आप देख भी नहीं पाएंगे .यही प्लास्टिक धीरे धीरे समुद्रीय जीवन में घुल मिल जाता है और फ़ूड चैन का हिस्सा बन जाता है .

ऐसे में जब समुद्री इलाको के पास रहने वाले लोग जो अधिकतर सी फ़ूड ही खाते है, उनके शरीर में ये प्लास्टिक के महीन टुकड़े धीरे धीरे जमा होना शुरू कर देते है और आगे जाकर ये किडनी फेलियर, लीवर फेलियर, इंटेस्टाइन में दिक्कत जैसे गंभीर रोगो की वजह बन जाती है .

हर साल मानसून के दौरान इस तरह की तस्वीरें बेहद आम होती है जब मुंबई के तमाम कोस्टल इलाको पर ढेरो टन प्लास्टिक का कचरा समुद्र से बाहर निकल आता है और फिर उसे हटाने में सैकड़ो में BMC के कर्मचारी दिन रात मेहनत करते है . लेकिन यही प्लास्टिक धीरे धीरे हमारी जमीन को बंजर बनता चला जा रहा है .

कई जानकर बताते है की सिर्फ समुद्रीय जनजीवन या इंसानो के लिए प्लास्टिक खतरनाक नहीं है बल्कि मुंबई जैसे महानगर जो समुद्र के किनारो पर बसें  हुए, उनके भूगोल के हिसाब से भी समुद्र में बढ़ता प्लास्टिक बहुत बड़ा खतरा है . मुंबई के आसपास बहुत बड़ी संख्या ने मैन्ग्रोव का इलाका आता है . कई रिसर्च में इस बात की पुष्टि हो चुकी है की शहर की बससवात के हिसाब से और खासतौर पर बाढ़ के खतरे से बचाने के लिए मैन्ग्रोव की बेहद अहम् भूमिका होती है.

प्लास्टिक के टुकड़े आपस में जब रगड़ते है तो मैक्रो और माइक्रो प्लास्टिक में बदल जाते है और फिर यही मैक्रो और माइक्रो टुकड़े मैन्ग्रोव के पौधों पर बैठ जाते है . इन मैक्रो और माइक्रो प्लास्टिक के टुकड़ो में कई तरह के रासायनिक तत्व होते है जिनकी वजह से बड़े और पुराने मैन्ग्रोव को तो कुछ नहीं होता है लेकिन धीरे धीरे इनमे से नए मैन्ग्रोव पैदा नहीं हो पाते है और फिर इलाके में मैन्ग्रोव की कम संख्या बाढ़ जैसे खतरे को बढ़ा देती है .