पानी का आपातकाल
July 8, 2019 • एग्रो इंडिया

 संपादकीय.

पानी का आपातकाल

भारत इस वक्त भयंकर जलसंकट और सूखे का सामना कर रहा है। प्रकृति से छेड़छाड़ और उसकी नेमतों की अनदेखी करने का नतीजा हम भुगत रहे हैं। लेकिन इस स्थिति की गंभीरता संपन्न वर्ग शायद तभी समझेगा, जब सरकार घोषणा कर दे कि भारत में इस वक्त पानी का आपातकाल लागू है। झुग्गी-झोपड़ियों और निचली बस्तियों में रहने वाले तो अक्सर ही ऐसे आपातकाल से जूझते हैं। वे सुबह-शाम पानी के टैंकरों का इंतजार करते हैं, और कड़ी जद्दोजहद से गुजारे लायक पानी हासिल करते हैं। पहले जो तालाब, बावड़ियां, पोखर उनके लिए उपलब्ध थे, उन पर भूमाफिया, प्रशासन और सरकार की गिद्धदृष्टि पड़ी और वे उनसे छीन लिए गए।

जलस्रोतों के खत्म होने या मार दिए जाने के कई मार्मिक किस्से प्राय: हर शहर में मिल जाएंगे। विकास के नाम पर जलस्रोतों की बलि अब भस्मासुर साबित हो रही है। भारत में जलसंकट तेजी से बढ़ रहा है। इसकी बानगी तमिलनाडु, आंध्रप्रदेश, महाराष्ट्र, उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश ऐसे कई राज्यों में देखने मिल रही है। मानसून देश के कुछ इलाकों में आ गया है, कुछ तपती गर्मी में बाारिश की बाट जोह रहे हैं। लेकिन अगर भरपूर बारिश होती भी है, तो भी अगली गर्मियों के बाद फिर सूखे जैसे हालात बनेंंगे, क्योंकि पानी को सहेजने की अपनी परंपरा और संस्कृति दोनों को हम पीछे छोड़ चुके हैं, रही-सही कसर शीतलपेय कंपनियों जैसे उद्योग और पानी माफिया पूरी कर रहे हैं। लेकिन सरकार अब भी जनता पर ही यह दायित्व डाल रही है कि वह जलसंरक्षण करे।

वैसे यह बात सही है कि जल, जंगल समेत तमाम प्राकृतिक संसाधनों को बचाना हर इंसान की जिम्मेदारी है और इसलिए समाज इस दायित्व से बरी नहीं हो सकता। लेकिन यह बात भी उतनी ही सही है कि इन संसाधनों का लालच भरा दोहन मुट्ठी भर लोग कर रहे हैं और खामियाजा गरीब लोग भुगत रहे हैं। इसलिए जब प्रधानमंत्री स्तर से जलसंरक्षण की बात आती है, तो उनसे यह सवाल भी किया जाना चाहिए कि सरकार पानी माफिया पर लगाम लगाने के लिए क्या कर रही है।

प्रधानमंत्री मोदी ने सत्ता की दूसरी पारी के पहले मन की बात कार्यक्रम में जलसंरक्षण का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि जल की महत्ता को सर्वोपरि रखते हुए देश में नया जल शक्ति मंत्रालय बनाया गया है। इससे पानी से संबंधित सभी विषयों पर तेजी से फ़ैसले लिए जा सकेंगे। मेरा पहला अनुरोध है, जैसे देशवासियों ने स्वच्छता को एक जन आंदोलन का रूप दे दिया। आइए, वैसे ही जल संरक्षण के लिए एक जन आंदोलन की शुरुआत करें। देशवासियों से मेरा दूसरा अनुरोध है, हमारे देश में पानी के संरक्षण के लिए कई पारंपरिक तौर-तरीके सदियों से उपयोग में लाए जा रहे हैं। मैं आप सभी से, जल संरक्षण के उन पारंपरिक तरीकों को शेयर करने का आग्रह करता हूं।

मोदीजी के मन की बात को कितने लोग सुनते हैं, और कितने समझते हैं, यह बड़ा सवाल है। वैसे उन्होंने जलशक्ति मंत्रालय से जो उम्मीद बंधाई हैं, वे कितनी पूरी हो पाएंगी, इसमें संदेह है। ऐसे ही ऐलान गंगा सफाई को लेकर भी किए गए थे। लेकिन न गंगा जैसी पौराणिक महत्व की नदियां बच पा रही हैं, न झीलें और तालाब। पूरे देश में 20 हजार किमी. तटबंध वाली 14 बड़ी नदियां हैं। और करीब 44 प्रतिशत पानी संचय करने की व्यवस्था है। 30 अरब एकड़ फीट वर्षा पानी सालाना मिलता है, लेकिन अधिकांश पानी वाष्प हो जाता है। अगर पानी संचय की क्षमता को बढ़ाया जाए, वर्षाजल को यूं ही बहने देने की जगह धरती के नीचे पहुंचाया जाए, तो सूखे की समस्या से निजात मिल सकती है। लेकिन यह होगा कैसे? सरकार इसके लिए क्या कोई सुव्यवस्थित योजना बना रही है? और क्या वह गारंटी दे सकती है कि जलसंरक्षण से जुड़े नियमों का कड़ाई से पालन होगा?

अभी हर गली, मोहल्ले में बोतलबंद पानी बिकता है, जिसकी न गुणवत्ता का कोई ठिकाना होता है, न ये पता होता है कि ये कितने कानूनी या गैरकानूनी तरीकों से बोतलों में बंद हो रहा है। लेकिन पानी की ऐसी बिक्री पर कोई कानूनी सख़्ती नहीं दिखती। यही हाल उन उद्योगों का भी है, जो अपना कचरा नदियों में बहा देते हैं। क्या इस विकट स्थिति में जल के लिए जनता का कोई आंदोलन कारगर हो सकता है? और अगर जनता अपने हक़ के पानी के लिए कोई आंदोलन खड़ा करे, तो क्या सरकार उस आंदोलन को अंजाम तक पहुंचाने में साथ देगी?