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वर्तमान कृषि नीति से तो खेती और शिक्षा दोनों पर रहेगा संकट
August 18, 2019 • एग्रो इंडिया

ऐसे तो न खेती बचेगी और न ही तालीम

 लेखक-   टी हक

 

इन दिनों देश में इस तरह की बातें चल रही हैं कि क्या हम कृषि प्रधान देश नहीं रहे तो इसे दो तरह से देखे जाने की जरूरत है। जहां तक आय की बात है तो यह साफ है कि अब हम कृषि प्रधान देश नहीं रहे। जीडीपी (सकल घरेलू उत्पाद) में अब कृषि की हिस्सेदारी 15 फीसदी रह गई है और यही हालात रहे तो अगले 15 साल में भारत की जीडीपी में कृषि की हिस्सेदारी केवल 5 फीसदी रह जाएगी। इसलिए आय के दृष्टिकोण से देखा जाए तो अब भारत कृषि प्रधान नहीं रह गया है, लेकिन यह पूरी तरह से सही नहीं है, क्योंकि कृषि पर निर्भर आबादी की दृष्टि से देखा जाए तो हम अभी भी कृषि प्रधान देश हैं। 2011 की जनगणना के मुताबिक, लगभग 55 फीसदी श्रम शक्ति (वर्क फोर्स) कृषि पर निर्भर है। कृषि पर निर्भर आबादी तो 65-70 फीसदी होगी और एनएसएसओ के मुताबिक, 2011 में 49 फीसदी श्रम शक्ति कृषि पर निर्भर थी और अब भी लगभग 44 फीसदी श्रम शक्ति कृषि पर निर्भर है। सीधे-सीधे यह कह देना कि “भारत कृषि प्रधान देश नहीं रहा” सही नहीं है।

अब यहां यह समझना जरूरी है कि कृषि से जुड़ी आबादी क्या करती है? पिछले कई सर्वे बताते हैं कि कई राज्य ऐसे हैं, जहां फसल की खेती से आमदनी कम है, लेकिन वहां के छोटे या सीमांत किसान या भूमिहीन किसानों की आय मजदूरी से भी होती है, वे बाहर नहीं जाते, बल्कि वहीं बड़े किसानों के पास खेत में काम करते हैं। वे कोई गैर कृषि गतिविधि नहीं करते। केरल, तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल, कर्नाटक सहित कई राज्यों में किसानों की जो कुल आमदनी है, उसमें खेतिहर मजदूरों का हिस्सा काफी उल्लेखनीय है। इसे गैर कृषि आय माना जाता है, लेकिन ऐसा नहीं है। जिसे अभी गैर कृषि आय कहा जा रहा है, सही मायने में वह गैर कृषि आय नहीं है। हां, गैर कृषि व्यापार आय की बात करें तो उसका अनुपात काफी कम है। इसलिए अभी यह कह देना जल्दबाजी होगा कि कृषि आधारित अर्थव्यवस्था में कमी आ रही है। इसकी एक वजह यह भी है कि देश में अभी भी कृषि क्षेत्र में जितनी संभावनाएं हैं, उसका दोहन ही नहीं किया गया। कई जिले ऐसे हैं, जहां देश में एक किसान परिवार की औसत आमदनी 6400 रुपए है, वहीं बंगाल, उड़ीसा, बिहार जैसे राज्यों में किसान परिवार की औसत आमदनी 4000 रुपए (2012-13 के सर्वे के मुताबिक) से भी कम है। इसका मतलब संभावनाएं अभी भी हैं, उत्पादकता, पैदावार भी काफी कम है। पंजाब के मुकाबले बिहार में पैदावार लगभग एक तिहाई है। अगर उन्हें सही कीमत दी जाए तो वे पैदावार बढ़ाएंगे, जिससे उनकी आमदनी भी बढ़ेगी। लेकिन यह नहीं होता। बिहार-उड़ीसा में सरकारी खरीददारी तक नहीं होती तो वहां के किसान पैदावार कैसे बढ़ाएंगे।

लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि गैर कृषि आय की भागीदारी बढ़ाने की जरूरत नहीं है। देश में गैर कृषि से होने वाली आय को बढ़ाने की सख्त जरूरत है। कृषि पर निर्भर इतनी बड़ी आबादी को केवल कृषि के भरोसे नहीं छोड़ सकते। अब या तो कृषि से होने वाली आमदनी बढ़ाइए या फिर गैर कृषि आमदनी बढ़ाइए। किसानों को ऐसे अवसर प्रदान करने होंगे कि वे अपनी खेती के अलावा दूसरे कार्यों से आमदनी बढ़ाए। जैसे- पशुपालन, मधुमक्खी पालन, मछली पालन आदि। सही मायने में किसानों की सुनिश्चित आमदनी गैर कृषि कार्य से ही होती है, वर्ना तो कृषि से होने वाली आमदनी का कोई भरोसा नहीं। कभी सूखा पड़ गया, कभी बाढ़ आ गई, कभी आग लग गई। खेती बाड़ी बहुत जोखिम भरा रोजगार का साधन हो चुका है। इसलिए गैर कृषि आय पर फोकस बढ़ाना होगा। लेकिन अभी भी किसान के लिए खेती-बाड़ी ही मुख्य साधन है।

हालांकि केवल गैर कृषि साधन बढ़ाने से ही किसानों की दशा नहीं सुधरेगी, उन्हें शिक्षा भी देनी होगी। किसानों को गांवों में ही बुनियादी सुविधाएं देनी होगी। इसमें स्वास्थ्य सुविधाएं, बाजार, बैंक जैसी सेवाएं भी शामिल हैं। अगर किसान के बच्चे शिक्षित होंगे तो वे गैर कृषि क्षेत्र में नौकरी भी कर सकते हैं। कौशल विकास कार्यक्रम चला कर उन्हें तकनीकी तौर पर मजबूत करने वे उद्यमिता की ओर भी अग्रसर होंगे। शिक्षा के अलग-अलग फायदे होते हैं। खासकर युवाओं के लिए यह सब करना पड़ेगा।

लेकिन कुछ हो नहीं रहा है। न तो कृषि क्षेत्र और ना गैर कृषि क्षेत्र की ओर ध्यान दिया जा रहा है तो क्या होगा? किसान और उसके परिवारों के सामने भूखमरी के सिवाय कोई रास्ता नहीं बचेगा या वे आपराधिक गतिविधियों में शामिल हो जाएंगे।

अगर आप कृषि क्षेत्र में सुधार लाना चाहते हैं तो आपको कृषि शिक्षा पर खास ध्यान देना होगा। अब कृषि क्षेत्र में नई-नई तकनीक की बात की जा रही है। ड्रोन के इस्तेमाल की बात हो रही है। सिंचाई में नई तकनीक की बात हो रही है। लेकिन यह सब तब ही संभव है, जब किसान को उसका तकनीक ज्ञान हो। उसे इसकी शिक्षा देने की जरूरत उन्हें किसान को ट्रेंड करना होगा। ताकि खेती बाड़ी में सुधार कर सके। साथ ही, कृषि क्षेत्र में नौकरी कर सके। राष्ट्रीय अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर जो इनोवेशन हो रहे हैं। उन्हें अगर आप जमीनी स्तर पर लागू नहीं करेंगे तो कृषि क्षेत्र में सुधार नहीं होगा। इसलिए कृषि शिक्षा की ओर बहुत ध्यान देना होगा।

किसानों को सीधे ट्रेनिंग देने की जरूरत है। अगर आप चाहते हैं कि किसान के बच्चे भी कृषि कार्य ही करे तो उन्हें कृषि शिक्षा देने की जरूरत है। खासकर आधुनिक तकनीक का ज्ञान देना पड़ेगा। तभी जाकर वे कृषि क्षेत्र में रहेंगे और आमदनी बढ़ाएंगे, लेकिन ओवरऑल जो स्थिति है, उससे लगता है कि कृषि क्षेत्र में लोग रहेंगे नहीं। खासकर युवा पीढ़ी। इसकी बड़ी वजह यह भी है कि खेत छोटे होते जा रहे हैं, जिससे आमदनी ज्यादा होती नहीं है। रिस्क भी बहुत है, लोग तैयार नहीं हो रहे हैं। अब तक हम कोई ऐसा मैकानिज्म तैयार नहीं कर पाए, जिससे खेती को जोखिम मुक्त बनाया जा सके। बीमा योजनाएं भी यह काम नहीं कर पाई हैं। सपोर्ट सिस्टम नहीं है। पैदावार ज्यादा हो जाए तो फेंकना पड़ता है। सिस्टम बनाना होगा कि एग्री को रिस्क फ्री कर दें। इसलिए युवा इस क्षेत्र में नहीं जाएंगे।

युवा कृषि की ओर जाना चाहते हैं, क्योंकि इस क्षेत्र में रोजगार की संभावनाएं बढ़ी हैं, लेकिन सरकारी कृषि विश्वविद्यालयों में सीटें नहीं बढ़ाई जा रही हैं, उन्हें सुविधाएं भी प्रदान नहीं की जा रही हैं। इसलिए इस क्षेत्र में प्राइवेट सेक्टर हाथ मार रहा है। पिछले दिनों भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईएसएआर) से कहा गया है कि वे अपने स्तर पर संसाधन जुटाएं। अब अगर वैज्ञानिक ही संसाधन जुटाने लगेगा तो वह रिसर्च क्या करेगा? संसाधन ही जुटाना था तो वह वैज्ञानिक क्यों बना?

यह सही नहीं है, इसे सरकारी क्षेत्र में रिसर्च खत्म हो जाएगी। प्राइवेट कंपनियां ही कृषि क्षेत्र में रिसर्च कराएंगी। जिनको बीज बेचना है, उर्वरक बेचना है, मशीन बेचना है, वे लोग ही कृषि क्षेत्र में रिसर्च करेंगे और अपने मुनाफे के लिए उसे लागू करेंगे। इससे प्राइवेट सेक्टर को फायदा होगा। जो वैज्ञानिक बनता है वह पैसे के पीछे नहीं भागता, इसलिए उन्हें रिसर्च करने दीजिए। बेशक थोड़े ही लोग रखिए, पर ढंगं के लोग रखिए। उनसे अच्छा काम कराइए। प्राइवेट सेक्टर हावी है, वह अच्छे से अच्छे साइंटिस्ट को नौकरी पर रखेगा और रिसर्च करके उसकी मार्केटिंग करेगा। अगर हम कृषि शिक्षा की ओर ध्यान देते हैँ तो हम कृषि क्षेत्र में काफी सुधार ला सकते।

(लेखक सेंटर फॉर सोशल डेवलपमेंट से जुड़े हैं। लेख राजू सजवान से बातचीत पर आधारित है)