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मध्यप्रदेश वन माफिया की गिरफ्त में ........अफसरों की मिलीभगत से हर साल हो जाती है 21000 करोड़ की वनोपज छोरी
November 18, 2019 • AGRO INDIA (Ramswaroop Mantri)
 
 
हर साल 21,000 करोड़ की वनोपज चोरी
 
 
76,429 वर्ग किमी में फैले मप्र के जंगलों से राज्य सरकार को करीब एक हजार करोड़ रुपए सालाना की आमदनी है। चौकाने वाली बात यह है कि हर साल करीब 21,000 करोड़ रुपए की वनोपज चोरी हो जाती है।
भोपाल । 76,429 वर्ग किमी में फैले मप्र के जंगल वन सम्पदा में समृद्ध हैं। लेकिन 1,500 लाख करोड़ के जंगल से सरकार की आमदनी करीब एक हजार करोड़ रुपए सालाना है। आंकड़ें चौकाने वाले हैं। लेकिन इससे भी चौकाने वाली बात यह है कि प्रदेश के जंगलों से हर साल करीब 21,000 करोड़ रुपए की वनोपज चोरी हो जाती है। जानकारों का कहना है की पूर्ववर्ती भाजपा सरकार के शासनकाल में मप्र के जंगलों में तेजी से माफियाराज बढ़ा। प्रदेश के जंगल आज भी इनकी गिरफ्त में हैं।
गौरतलब है कि देश के 12 प्रतिशत जंगल अकेले मप्र में हैं। वर्ष 2001 के आंकड़ों के अनुसार (स्टेट ऑफ फारेस्ट रिपोर्ट 2001 एफएसआई) मध्यप्रदेश में वन विभाग के नियंत्रण में 95221 वर्ग किलोमीटर का क्षेत्रफल आता है जबकि इसमें वास्तव में 77265 वर्ग किमी की जमीन पर ही जंगल दर्ज किया गया है। इसका मतलब यह है कि 18 हजार वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र में जंगल नहीं है फिर भी वन विभाग का उस पर नियंत्रण है। इसमें से भी सघन वन का क्षेत्रफल 44384 वर्ग किलोमीटर ही है। वर्तमान स्थिति में मप्र में क्षेत्रफल की दृष्टि से सबसे ज्यादा, 76429 वर्ग किलोमीटर जंगल है। इस लिहाज से मप्र वन सम्पदा में भी समृद्ध है। यही वन सम्पदा माफिया को अपनी ओर आकर्षित करता है।
सत्ता, पूंजी, माफिया का त्रिकोण
वन संपदा मानव के लिए प्रकृति का नायाब तोहफा है। आदिकाल से मनुष्य वन संपदा से ही जीविकोपार्जन करता रहा है। आज भी वनांचल के ग्रामीण प्रकृति के इस संपदा से लाभ अर्जित कर रहे हैं। वनांचल में ग्रामीण मौसम के साथ वन संपदा जैसे काष्ठ, बांस, सालबीज, अचार गुठली, पलास लाख, कुसुम लाख, गोंद, तेंदू, चार, माहुल पत्ता, कचरिया, बाल हर्रा, महुआ फूल, महुआ गुल्ली, करंज बीज, नीम बीज, सलई गोंद, हर्रा, बहेड़ा, विभिन्न जड़ी-बूटी और तेंदूपत्ता का संग्रहण करते हैं। समय के साथ शासन ने इन वनोपजों के लिए खरीद-फरोख्त की नीतियां बनाई और उसका लाभ वनोपज संग्राहकों को देने की कोशिश की है। लेकिन सरकारी प्रयास के साथ ही सत्ता, पूंजी और माफिया का ऐसा त्रिकोण बना कि आज मप्र के जंगलों से जितना सरकार को राजस्व प्राप्त होता है उससे कई गुना माफिया लूट ले जाते हैं।
मप्र में जंगल का खजाना
मप्र सरकार के वन विभाग ने प्रदेश के जंगलों में पाए जाने वाले टिम्बर और लकड़ी की कुल मात्रा 500 लाख क्यूबिक मीटर आंकी है जिसकी कीमत ढाई लाख करोड़ रूपए है। जबकि जंगल से मिलने वाले अन्य उत्पादों की वैधानिक कीमत 1,000 करोड़ रुपए प्रति वर्ष है। नियमों का उल्लंघन कर होने वाला वास्तविक व्यापार साढ़े 7,000 करोड़ रुपए का है, जबकि करीब 14,000 करोड़ रुपए की वन संपदा की चोरी माफिया करवाते हैं। और यही लड़ाई का सबसे बड़ा आधार भी है। मप्र में सरकार के वन विभाग से अभी केवल 1,000 करोड़ रुपए की आय ही होती है। समानान्तर रूप से नीतियों और कानून को प्रभावित करने वाले समूह (उद्योग, ठेकेदार, राजनैतिक व्यक्तित्व और अफसर) वन संसाधनों का सबसे ज्यादा फायदा उठाते हैं। यह स्थिति तब है जब सरकार प्रदेश के वनों, वन उपज और वन्य जीवों की सुरक्षा के नाम पर हर साल करोड़ों रुपए खर्च करती है। वन सुरक्षा एवं वन विकास के लिए 15,228 समितियां कार्यरत है। इनमें 9,650 ग्राम वन समिति, 4,747 वन सुरक्षा समिति और 831 ईको विकास समितियां शामिल हैं। सूत्र बताते हैं कि प्रदेश के वन क्षेत्र में जितनी भी अवैध गतिविधियां चलती हैं उसमें वन विभाग के अफसरों की मिलीभगत होगी है।
साढ़े 5 लाख हेक्टेयर जमीन पर अवैध कब्जा : पर्यावरण एवं वन मंत्रालय की एक रिपोर्ट के अनुसार देश भर में वनभूमि पर सबसे ज्यादा कब्जा मध्य प्रदेश में है। आंकडों के मुताबिक मध्य प्रदेश में वन भूमि पर लगभग साढ़े 5 लाख हेक्टेयर जमीन पर अवैध कब्जा किया गया है। देश भर में वन भूमि पर किसी राज्य में किए गए कब्जों के मामलों में ये सबसे ज्यादा है। इस रिपोर्ट के मुताबिक साल 2014 में वन विभाग ने जितनी भूमि पर अतिक्रमण बताया था, उसमें अभी भी कोई कमी नहीं आई है। प्रदेश में वन की 5 लाख 34 हजार 777 हेक्टेयर जमीन पर अवैध कब्जा है। यह स्थिति तब है जब 2005 में तत्कालीन मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने वन भूमि में हुए अतिक्रमण को हटाने की कार्रवाई तत्काल शुरू करने की बात भी कही थी। उसके बावजूद अतिक्रमण बढ़ता ही गया। इधर, मप्र वन विभाग के अनुसार पिछले पांच सालों में अवैध वन कटाई के मामले दो लाख 65 हजार 945 तक पहुंच गए हैं। अवैध परिवहन की संख्या भी 10 हजार 708 हो गई। पिछले पांच सालों में फॉरेस्ट की 16 हजार 48 हेक्टेयर जमीन पर कब्जा किया गया।
मिशन बनाया, लेकिन नहीं दिया बजट
तत्कालीन मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने वर्ष 2013 में बंसोड़ पंचायत बुलाई थी। इसमें बंसोड़ों ने यह मांग रखी कि उन्हें बांस नहीं मिलता है, उन्हें सब्सिडी दरों पर बांस उपलब्ध कराया जाए। बांस की पैदावार बढ़ाने के लिए शिवराज सिंह चौहान ने बांस मिशन का गठन कर दिया। मिशन बनने के बाद 6 साल तक इसके स्थापना व्यय और वेतन के अलावा कोई बजट नहीं दिया। इससे मिशन बांस की खेती को प्रोत्साहन और उद्योग स्थापित करने के के लिए कोई काम ही नहीं कर पाया। वर्ष 2018-19 में मोदी सरकार ने मिशन के लिए 28 करोड़ का बजट आवंटित किया, जिसके लिए कार्य योजना बनाई है। इस राशि से दो हजार किसानों से 4 हजार एकड़ में बांस की खेती कराई गई है। मिशन ने केन्द सरकार से वर्ष 2019-20 के लिए 35 करोड़ रूपए की मांग की है। प्रदेश में टिशू कल्चर के माध्यम से बांस की नई-नई प्रजातियां तैयार की जा रही हैं। इन प्रजातियों का उपयोग पूरी तरह से व्यावसायिक है। वर्तमान में 20 तरह के प्रजातियों को तैयार करने का काम चल रहा है। बांस की पांच तरह की प्रजातियां पहले से ही प्रदेश में मौजूद हैं। जबकि बांस की 35 तरह की प्रजातियां पूरे देश में पाई जाती हैं।
33 वन मंडलों में पूरी तरह से समाप्त हो गए बांस
प्रदेश में बांस की उत्पादकता साल दर साल घटती जा रही है। पिछले दस सालों के अंदर इसके उत्पादन क्षेत्रों में भी भारी कमी आई है। बांस मिशन बांसों के उत्पादन बढ़ाने के लिए करोड़ों रुपए फूंक रहा है, इसके बाद भी प्रदेश को जरूरत के लिए बांस की खेती नहीं करवा पा रहा है। हालत यह है कि प्रदेश की जरूरत का सत्तर फीसदी बांस दूसरे राज्यों से खरीदना पड़ रहा है। प्रदेश में 63 वन मंडलों में से अब केवल 30 वन मंडलों में बांस के वन बचे हैं। पिछले 15 वर्षों में दक्षिण पन्ना, दक्षिण सागर, डिंडोरी, गुना, अशोक नगर, खरगौन सहित 8 वन मंडलों में पूरी तरह से बांस समाप्त हो गए हैं। धीरे-धीरे जंगलों से बांस समाप्त होते जा रहे हैं। इसकी मुख्य वजह यह है कि सरकार ने बांस को लघु वनोपज की श्रेणी में डाल दिया है। इससे जंगल के आस-पास के लोगों को उनके उपयोग के लिए बांस काटने पर प्रतिबंधित नहीं किया जाता है। इस फैसले से लोग जंगलों से बांस काटना तेजी से शुरू कर दिया है। प्रदेश में 25 हजार टन बांस वनों में है और 30 हजार टन बांस निजी खेतों पैदा होता है। लेकिन प्रदेश में बांस उद्योग नहीं हैं।
अफसरों के साथ मिलकर किया जाता है अवैध व्यापार
प्रदेश में वनोपज चोरी रोकने के तमाम प्रयास फेल साबित हो रहे हैं। हर जिले और प्रदेश की सीमा पर वनोपज नाके और उन पर भारी भरकम स्टाफ पदस्थ होने के बावजूद प्रदेश के जंगलों से हर साल हजारों करोड़ रुपए मूल्य की वनोपज चोरी हो रही है। पलास लाख, कुसुम लाख, गोंद, तेंदू, चार, माहुल पत्ता, कचरिया, बाल हर्रा, महुआ फूल, महुआ गुल्ली, करंज बीज, नीम बीज, सलई गोंद, हर्रा, बहेड़ा, विभिन्न जड़ी-बूटी आदि का अफसरों के साथ मिलकर अवैध व्यापार किया जाता है। अकेले एक हजार करोड़ से अधिक की सलई गोंद की ही चोरी की जाती है। आदिवासियों या मजदूरों से 50 से 100 रुपए प्रति किलो की दर से खरीदी जाने वाली यह गोंद सऊदी अरब में दो हजार रुपए किलो बिकती है। इंदौर के कई व्यापारी सलई गोंद का व्यापार करते हैं। ज्यादा से ज्यादा गोंद निकालने के लिए पेड़ों को खरोंचा जाता है। इस गोंद से गूगल बनता है, जो पूजा-पाठ के अलावा दवाओं में काम आता है। सलई गोंद का प्रदेश में बड़ा व्यापार है। खासकर मालवा अंचल में गोंद के लिए जंगलों में सलई प्रजाति के पेड़ को नुकसान पहुंचाया जा रहा है। ज्यादा गोंद निकालने के लिए पेड़ों की गैटलिंग (पेड़ के तने पर खरोंचना) की जाती है। इससे पेड़ के तने से ज्यादा पानी निकलता है, जो सूखकर गोंद बनता है। प्रदेश में इतने बड़े व्यापार का खुलासा फरवरी 2019 में तब हुआ, जब खंडवा में गोंद से भरा आयशर ट्रक पकड़ाया। यह माल खरगोन, खंडवा, बुरहानपुर के जंगलों से लाया जा रहा था। जबकि इस क्षेत्र में सलई गोंद निकालना प्रतिबंधित है। वैसे यह मालवा अंचल तक ही सीमित नहीं रहा है। प्रदेश के दूसरे हिस्सों से भी गोंद निकाली जा रही है। इसकी बड़ी मंडी इंदौर में है। जहां के व्यापारी मजदूर लगाकर गोंद निकलवाते हैं, जो 50 से 100 रुपए प्रति किलो में खरीदी जाती है। मुंबई के व्यापारी इंदौर से ये गोंद को 400 रुपए किलो में खरीदकर आगे भेजते हैं। सलई गोंद निकालने के बुरहानपुर, खरगोन और खंडवा में दो सौ से ज्यादा मामले दर्ज हैं। आसपास के जिलों के जंगलों से निकाली जा रही सलई गोंद इंदौर में इकठ्ठी होती है। यहां व्यापारियों के गोदामों में दो सौ से पांच सौ क्विंटल गोंद का स्टाक मिल जाएगा। वन विभाग की टीम ने फरवरी में कार्रवाई के दौरान इंदौर के एक व्यापारी के गोदाम पर छापा मारा था और बाद में उसी को स्टाक सौंप दिया। इस मामले ने इतना तूल पकड़ा कि खंडवा वन वृत्त के तत्कालीन सीसीएफ को हटना पड़ा।
9 लाख श्रमिकों पर आजीविका का संकट
इधर तेंदूपत्ता के गिरते भाव से इस कार्य में लगे प्रदेश के लगभग 9 लाख श्रमिकों के सामने आजीविका का संकट खड़ा होता जा रहा है। भाव कम होने से श्रमिकों ने तेंदूपत्ते का संग्रहण करना भी कम कर दिया है। तेंदूपत्ते की बिक्री में आ रही साल-दर-साल आई गिरावट के कारणों को जानने के लिए मध्यप्रदेश लघु वनोपज संघ एक सर्वे कराने की तैयारी कर रहा है। सर्वे में इस बात का भी पता लगाया जाएगा कि प्रदेश में कितने लोग बीड़ी पीते हैं और तंबाकू का उपयोग गुटखा और पान मसालों कितनी मात्रा में हो रहा है। सर्वे रिपोर्ट के आधार पर संघ श्रमिकों के रोजगार के लिए कुछ सकारात्मक कदम उठाने का प्रयास करेगा। तेंदूपत्ते के भाव में हर साल 700 से 800 रुपए प्रति मानक बोरा के मान से कमी आ रही है। वर्ष 2017 और 2019 के बीच में तेंदूपत्ते के भाव में 16 सौ रुपए प्रति मानक बोरा की कमी आई है। जबकि लघु वनोपज संघ ने इसकी गुणवत्ता और रख-रखाव में बेहतरी के लिए गुणात्मक प्रयास किए हैं। इसकी क्वालिटी पर नजर रखने के लिए हर फड़ पर एक अलग से वनकर्मी की नियुक्ति की जाती है। पानी और सीलन से बचाने के लिए बंद गोदामों का इंतजाम किया जाता है। इसके बाद भी इसकी बिक्री धीरे-धीरे घटती जा रही है। अब हरे पत्तों की बिक्री के बाद सूखे पत्ते उठाने और खरीदने में व्यापारी पीछे हटने लगे हैं। पिछले दो वर्षों का 3.50 लाख मानक बोरा तेंदूपत्ता अभी तक नहीं बिका है। इसे बेंचने के लिए कई बार निविदा जारी की गई, लेकिन व्यापारी खरीदने के लिए ही तैयार नहीं हो रहे हैं। संघ के अधिकारियों का कहना है कि बीड़ी की मांग कम होने से फरवरी-मार्च में जो हरे तेंदू के पत्ते खरीदे लेते हैं, उतने की ही बीड़ी व्यापारी नहीं बेंच पा रहे हैं। इसके चलते सूखे पत्ते वे नहीं खरीद रहे हैं। बीड़ी पीने वाले लोंगों की संख्या धीरे-धीरे घटती जा रही है। इसके चलते तेंदूपत्ते की बिक्री भी धीरे-धीरे कम हो रही है। इससे तेंदूपत्ता संग्रहण और इसके फड़ तैयार करने में लगे 9 लाख श्रमिकों के सामने भविष्य का संकट खड़ा हो गया है। पिछले 5-7 वर्षों से इसके रेट गिरने के साथ ही बिक्री भी गिरती जा रही है। वर्ष 2017 में 1339.38 करोड़ रूपए का तेंदूपत्ता बेंचा गया था और उसका लाभांश श्रमिकों को बांटा गया था, लेकिन इस वर्ष मात्र 744.52 करोड़ रुपए का तेंदूपत्ता बेंचा गया है। हालांकि इस वर्ष अब तक के इतिहास में सबसे ज्यादा 03.04 लाख मानक बोरा तेंदूपत्ता नहीं बिका है।
सुरक्षा में तकनीक की भूमिका बढ़ाने पर जोर: वनमंत्री
वनमंत्री उमंग सिंघार ने इस बात को स्वीकार किया है कि प्रदेश में सलई गोंद का अवैध कारोबार चल रहा है। इसलिए वे जंगल की सुरक्षा के लिए तकनीक की भूमिका पर जोर दे रहे हैं। हालांकि वनों के सुधार और अतिक्रमण रोकने में आईटी (सूचना प्रौद्योगिकी) की हिस्सेदारी बढ़ाने की वनमंत्री उमंग सिंघार की कोशिशों पर पानी फिरता नजर आ रहा है। मंत्री विभाग की अलग-अलग शाखाओं से इसके लिए राशि की मांग कर चुके हैं, लेकिन कहीं से भी सफलता नहीं मिल रही है। हाल ही में कैंपा फंड से स्टेट फॉरेस्ट रिसर्च इंस्टीट्यूट (एसएफआरआई) जबलपुर को 60 करोड़ रुपए देने का प्रस्ताव भी खारिज हो गया। इस प्रस्ताव पर भी वित्त विभाग के अफसरों ने आपत्ति ली थी। इसे अब मुख्य सचिव की अध्यक्षता वाली संचालन समिति में ले जाने की तैयारी है। मंत्री जंगलों की सुरक्षा में तकनीक की भूमिका बढ़ाना चाहते हैं। इसके लिए मैदानी वन अफसरों से प्लान भी मांगे गए हैं और वित्त विभाग से बजट भी, लेकिन बजट मिलना संभव नहीं हुआ तो विभाग की अलग-अलग शाखाओं से राशि इक_ा करने की कोशिश हुई। पहले मप्र राज्य लघु वनोपज संघ से कोशिश की गई। फिर कैंपा फंड से और अब कैंपा से एसएफआरआई को राशि दिलाने की कोशिश थी। इसके पीछे उद्देश्य बेहतर अनुसंधान था। यह प्रस्ताव वन बल प्रमुख की अध्यक्षता में गठित कैंपा फंड की एग्जीक्यूटिव कमेटी की बैठक में पिछले दिनों रखा गया। कमेटी में वित्त विभाग के अफसर भी शामिल हैं। प्रदेश में जंगलों में लकड़ी चोरी और शिकार के मामले सामने आते रहते हैं। ऐसे मामलों पर कड़ाई से रोक लगाने के लिए मंत्री ने उपग्रह की मदद लेने का फैसला किया है। वे उपग्रह की मदद से जंगलों की रखवाली करना चाहते हैं। इस योजना पर करीब ढाई सौ करोड़ रुपए खर्च होने हैं।
वन धन पर सरकार की नजर
केंद्र सरकार का नया वन धन कार्यक्रम आ चुका है। यह गैर-लकड़ी के वन उत्पादन का उपयोग करके जनजातियों के लिए आजीविका के साधन मुहैया कराने की पहल है। मतलब देश के वन धन हैं, कुदरत के कुबेर हैं। इसलिए सरकार कहती है वन से धन कमाना है। याद होगा, जंगलों को कमाई के स्रोत बता कर गोरों ने जंगलात विभाग बनाया था। आज जनमत से चुनी गई सरकार भी बता रही है कि जंगलों के बूते गरीब कैसे अमीर बनें। अमीर बनने के उपाय-जुगाड़ और नुस्खे सरकार के उन नौकरशाहों के पास हैं जो जनजातीय कार्य मंत्रालय से लेकर ट्राईफेड (द ट्राइबल को-ऑपरेटिव मार्केटिंग डवलपमेंट फेडरेशन ऑफ इंडिया) जैसी संस्थाओं में बैठ कर बताते हैं कि आदिवासी भारत में कितना लावण्य है, कितनी मोहकता है, बांस-घास और टहनियों से बने भवनों की भव्यता है और खलिहानों में विराजती श्रेष्ठता है। आदिवासी भारत के विभिन्न उत्पादों और कलाकृतियों को संजोती कॉफी टेबल बुक सत्ता के गढ़ों से लेकर प्रशासन के बुर्जों पर सजाई जा रही हैं। वन धन योजना के तहत जंगलों में सीमित मात्रा में मिलने वाले खाद्य पदार्थों के संग्रह करने और उन उत्पादों को बेहतर ढंग से इस्तेमाल किए जाने का गुर आदिवासियों को सिखाया जाएगा। यानी आदिवासियों का लघु वनोपजों से संबंधित लोकज्ञान अधूरा और अवैज्ञानिक है, ऐसा नौकरशाही मानती है। नौकरशाही कहती है कि जंगलों से सीमित मात्रा में मिलने वाले उत्पाद कुछ खास समय के दौरान ही मिलते हैं। ऐसे में विपरीत मौसम में आदिवासी समुदाय को अपनी आजीविका चलाने और जीवनयापन करने में बेहद दिक्कतों का सामना करना पड़ता है। इसलिए वन धन विकास केंद्रों के जरिए एकत्र किए गए लघु वनोपजों जमा कर उनको प्रस्संकृत करके सुरक्षित रखा जाएगा, ताकि प्रतिकूल मौसम या परिस्थितियों के हिसाब से उन वस्तुओं का उचित उपयोग किया जा सके। तो क्या आज तक विज्ञान और प्रौद्योगिकी मंत्रालय के जैव-तकनीकी विभाग ने इसी दर्शन और विचार पर किसी तरह का कोई काम नहीं किया? क्या सरकार ने कभी इस सच को जानने की कोशिश की?
आदिवासियों से हर्बल खेती कराएगी सरकार
आदिवासियों को रोजगार से जोडऩे के लिए सरकार एक एकड़ जमीन देने की तैयारी कर रही है। इसमें आदिवासी हर्बल खेती करेंगे और मेडिशनल प्लांट उगाएंगे। सरकार पौधों से लेकर उत्पाद तक की खरीदने की बाय बैक गारंटी देगी। आदिवासियों आवंटन के लिए पड़त जमीनों की तलाश शुरू कर दी गई है। लाभार्थियों का चयन पहले आओ-पहले पाओ की तर्ज पर किया जाएगा। दरअसल, परंपरागत रूप से वन क्षेत्रों में रहने वाले आदिवासी औषधीय पौधों के बारे में बेहतर तरीके से जानते हैं। इनका इस्तेमाल भी दवा के रूप में करते हैं। इसी हुनर को निखारने के लिए सरकार आदिवासी क्षेत्र में हर्बल खेती को बढ़ावा देने जा रही है। आदिवासी परिवारों को पड़त की एक एकड़ जमीन सरकार देगी और उसे विकसित किए जाने में आने वाले खर्च को भी वहन करेगी। इन आदिवासी किसानों को सीधे लघु वनोपज संघ की समितियों से जोड़ा जाएगा। समितियां हर्बल खेती के आधुनिक तरीकों को समझाएंगे और बीज व अन्य जरूरत की चीज उपलब्ध कराएंगें। आदिवासियों द्वारा तैयार किए गए पौधे और अन्य हर्बल उत्पाद को सरकार खुद खरीदेगी। लघु वनोपज संघ उन्हें बाय बैक गारंटी देगी। ताकि किसानों को बाजार की तलाश में भटकना नहीं पड़े।
आदिवासियों के लिए हवाई किला
देश के जंगल वन विभाग और लाल आतंक के चलते आदिवासियों की पहुंच से दूर हैं। जंगलों से आजीविका चलाने की बात आदिवासियों के लिए हवाई किला बनाने जैसा है। लेकिन इस सच को नजरअंदाज कर जैसे नौकरशाही ने माना कि जो दिखता है, वही बिकता है। लिहाजा, उन आदिम लोगों, उनके घरों और धरोहरों को सजाओ, चमकाओ और दिखाओ। आदिवासी जंगली उत्पादों का सहजता से संग्रह करते हैं। वन धन योजना में उन ज्वलंत मुद्दों की अनदेखी की गई है कि वनौषधियों के चोखे धंधे में जंगलों पर तस्करों का कितना जबरदस्त शिकंजा है। आदिवासियों के लिए किए जाने वाले फैसलों की फेहरिस्त कितनी कारगर और उनके लिए कितनी मुफीद होती है, यह एक बुनियादी सवाल है। इसके लिए हमें जान लेना होगा कि वन धन कितना ठोस है या महज शिगूफा है। नौकरशाही यह मानने की भूल कर रही है कि आदिवासी भारत की पूरी आबादी अपने गांव में बैठी है और वनोपज संग्रह की उनकी प्रवृति बरकरार है। आदिवासियों ने वनोपजों के बूते जिंदगी नहीं चला पाने का निष्कर्ष बहुत पहले निकाल लिया और आज कालाहांडी से लेकर गुमला और कांकेड़ के आदिवासी जंगलों में भटकाव और पत्थरों पर माथा टिकाने के बजाय देश के औद्योगिक नगरों में अपेक्षाकृत सहज श्रम कर सम्मानित जिंदगी जी रहे हैं। सरकार ने खुद आदिवासियों को वनाश्रित जीवन दर्शन से दूर कर पैकेज परोसकर मुफ्तजीवी बनाया है। इस योजना का सबसे कमजोर पक्ष यही है कि वन धन आदिवासियों के हितों का और उनके संगठन के ब्रांड के मंसूबे नहीं रखता। सूत्र बताते हैं कि जब तक समाज पारम्परिक रूप से जंगलों का संरक्षण और उपभोग एक साथ करता रहा तब तक जंगल में मंगल रहा। ब्रिटिश हुकूमत के दौर में सन् 1862 यानी देश के पहले स्वाधीनता संग्राम के ठीक पांच वर्ष बाद वन विभाग की स्थापना की। वे वन विभाग के जरिए उपनिवेशवाद को सशक्त करने के लिये जंगलों पर अपना मालिकाना हक चाहते थे। मध्यप्रदेश में 10 जुलाई 1958 को राजपत्र में एक पृष्ठ की अधिसूचना प्रकाशित करके 94 लाख हेक्टेयर सामुदायिक भूमि (जंगल) को वन विभाग की सम्पत्ति के रूप में परिभाषित कर दिया गया। यूं कि इस 94 लाख हेक्टेयर भूमि में से कितने हिस्से पर आदिवासी या अन्य ग्रामीण रह रहे हैं, खेती कर रहे हैं या पशु चरा रहे हैं, यह विश्लेषण नहीं किया गया। चूंकि आदिवासियों के पास निजी मालिकाना हक के कोई दस्तावेजी प्रमाण नहीं रहें हैं। इसलिए उनके हक को अवैध और गैर-कानूनी माना जाने लगा। पहले (स्वतंत्रता से पूर्व) की व्यवस्था में हर गांव का एक दस्तावेज होता था, उसमें यह स्पष्ट उल्लेख रहता था कि गांव में कितनी भूमि है, उसका उपयोग कौन-कौन किस तरह से कर रहा है। वही गांव के मालिकाना हक का वैधानिक दस्तावेज था; इसे बाजिबुल-अर्ज कहा जाता था। जंगल के इसी हस्तांतरण के कारण आदिवासियों के वैधानिक शोषण की शुरूआत हुई।