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सरकार की लापरवाही से यूरिया की कालाबाजारी चरम पर...... चारों ओर से लुटा रहा है मध्य प्रदेश का किसान
November 18, 2019 • AGRO INDIA (Ramswaroop Mantri)
यूरिया की कालाबाजारी…!
किसानों को लगेगी 164 अरब की चपत
 
मध्य प्रदेश के किसानों पर अब खाद की कालाबाजारी की भी मार पडऩे वाली है। रबी की खेती की तैयारी में जुटा किसान खाद-बीज की खरीदी में भी ठगा रहा है। प्रदेश में वर्तमान में यूरिया खाद की जिस तरह कालाबाजारी की जा रही है उससे अनुमानत: प्रदेश के किसानों को करीब 164 अरब रुपए की चपत लगने का अनुमान है। देश में सालाना 320 लाख मीट्रिक टन यूरिया की खपत होती है। इसमें से 50 से 60 लाख मीट्रिक टन आयात किया जाता है। जहां तक मप्र की बात है तो यहां करीब 15 लाख 40 हजार मीट्रिक टन यूरिया की खपत रबी फसलों की खेती में संभावित है। लेकिन शासन स्तर पर तय दरों (यूरिया लगभग 266.50 रुपए प्रति बोरी) में बड़ी मुश्किल से मिलने वाला खाद बाजार में बढ़ी हुई दरों (लगभग 320 रुपए तक) में आसानी से मिल रहा है। यानी एक बोरी पर किसान को करीब 53 रूपए अधिक देने पड़ रहे हैं। सरकारी एजेंसियों से हमेशा कुछ न कुछ कहकर टरका दिया जाता है और किसानों को निजी व्यापारियों से महंगी दरों पर खाद खरीदने की नौबत आती है। 
 
भोपाल । कर्ज माफी, बोनस, भावांतर के भंवर में फंसें मप्र के किसान प्राकृतिक आपदा और उपज के दाम की मार झेल ही रहे हैं कि उन पर अब खाद की कालाबाजारी की भी मार पडऩे वाली है। रबी की खेती की तैयारी में जुटा किसान खाद-बीज की खरीदी में भी ठगा रहा है। प्रदेश में वर्तमान में यूरिया खाद की जिस तरह कालाबाजारी की जा रही है उससे अनुमानत: प्रदेश के किसानों को करीब 164 अरब रूपए की चपत लगने का अनुमान है। कृषि विभाग से मिली जानकारी के अनुसार देश में सालाना 320 लाख मीट्रिक टन यूरिया की खपत होती है। इसमें से 50 से 60 लाख मीट्रिक टन आयात किया जाता है। जहां तक मप्र की बात है तो यहां करीब 15 लाख 40 हजार मीट्रिक टन यूरिया की खपत रबी फसलों की खेती में संभावित है। लेकिन शासन स्तर पर तय दरों (यूरिया लगभग 266.50 रुपए प्रति बोरी) में बड़ी मुश्किल से मिलने वाला खाद बाजार में बढ़ी हुई दरों (लगभग 320 रुपए तक) में आसानी से मिल रहा है। यानी एक बोरी पर किसान को करीब 53 रूपए अधिक देने पड़ रहे हैं।
शुरुआत में ही शिकायतों की भरमार: वर्ष 2018 में खाद की किल्लत और कालाबाजारी को देखते हुए प्रदेश सरकार ने इस बार विशेष सतर्कता बरतनी शुरू कर दी है, लेकिन रबी सीजन की शुरुआत में ही यूरिया की कालाबाजारी और किसानों के साथ धोखाधड़ी की शिकायतें प्रशासन के पास पहुंचने लगी हैं। शासन के पास पर्याप्त खाद होने के बाद भी किसान परेशान हो रहे हैं। क्योंकि सीजन से पहले ही निजी सप्लायरों ने खाद का स्टॉक कर लिया है। खाद एवं यूरिया के नाम पर किसानों के साथ धोखा करने एवं खाद बीज एवं यूरिया को अवैधानिक रूप से कालाबाजारी करने के संबंध में लिखित शिकायतें लगातार बढ़ रही हैं। कृषि विभाग के सूत्रों के अनुसार, प्रदेश का कोई भी ऐसा जिला नहीं है जहां खाद की कालाबाजारी के मामले सामने न आ रहे हों।
खास बात यह है कि ब्लॉक और जिला स्तर पर ऐसे तमाम बड़े सप्लायर्स पर कभी कोई कार्रवाई नहीं होती। उल्टा कृषि विभाग के ब्लॉक स्तर के जिम्मेदार अधिकारी संबंधित दुकानदारों को आगाह कर देते हैं। भारतीय किसान संघ के पदाधिकारियों ने आरोप लगाया कि खाद का व्यापक धंधा करने के मकसद से हर बार इसकी कालाबाजारी होती है। बड़े स्तर पर सप्लायर्स जिलों के अधिकारियों से सेटिंग कर लेते हैं, ऑफ सीजन में स्टॉक जमा लेते हैं इसके बाद उन्हें निजी तौर पर मनमानी दरों में उस वक्त बेचते हैं जब किसानों को इसकी जरूरत होती है और सरकारी केंद्रों पर हंगामे की नौबत आती हो। बता दें कि इस समय सरकारी केंद्रों पर शासन स्तर पर इसलिए खाद देने से रोका गया है कि अभी किसानों को इसकी जरूरत नहीं है, ऐसे में 60 फीसदी सप्लाय के हिसाब से पर्याप्त खाद शासन के पास है कोई शॉर्टेज नहीं आएगी, निजी दुकानों से वे न खरीदें। इधर, किसानों के सामने दिक्कत यह है कि मुश्किल से सप्ताहभर बाद खाद की जरूरत पडऩा है। उपज बेचने आने के दौरान वे इसलिए खाद समय से ले जाना चाहते हैं कि भीड़ जमा होने पर फिर हंगामे की नौबत न आए? इन्हीं तमाम प्रकार की किसानों के मजबूरियों का लाभ और जिम्मेदार अधिकारियों की मिलीभगत से निजी सप्लायर्स की चांदी हो जाती है।
उर्वरकों की कीमत में कमी, किसानों को पता नहीं
मप्र कृषि प्रधान प्रदेश हैं। लेकिन विसंगति यह है कि यहां किसानों को यह जानकारी नहीं रहती है कि सरकार स्तर पर खाद-बीज की क्या कीमत है। अभी हाल ही में देश की अग्रणी उर्वरक सहकारी संस्था इफको ने गैर यूरिया उर्वरक की कीमत में 50 रुपए प्रति बैग की कमी की है। इफको ने डाई-अमोनियम फॉस्फेट (डीएपी) सहित अपने कॉम्प्लेक्स उर्वरक की खुदरा कीमत 50 रुपए प्रति बैग घटाने की घोषणा की है। इफको ने कहा है कि दुनियाभर में कच्चे माल और विनिर्मित उर्वरक की कीमतों में कमी आने के फलस्वरूप यह कदम उठाया गया है। इफको के डीएपी का नया मूल्य अब 1250 रुपए प्रति 50 किग्रा बैग होगा, जो इससे पहले 1300 रुपए प्रति बैग था। एनपीके-1 कॉम्प्लेक्स की कीमत घटकर अब 1200 रुपए प्रति बैग होगी, जो इससे पहले 1250 रुपए प्रति बैग थी। एनपीके-2 कॉम्प्लेक्स की कीमत घटकर अब 1210 रुपए प्रति बैग होगी, जो इससे पहले 1260 रुपए प्रति बैग थी। इसी प्रकार एनपी कॉम्प्लेक्स की खुदरा कीमत 50 रुपए घटने के बाद 950 रुपए प्रति बैग हो गई है। लेकिन किसानों को इसकी जानकारी ही नहीं है।
60 फीसदी सरकारी, 40 निजी से सप्लाय का नियम
कृषि विभाग और एनएफएल के अनुसार शासन स्तर पर यूरिया सहित अन्य खाद की सप्लाई के लिए नियम है कि किसानों को मार्कफेड और सोसायटियों से 60 फीसदी सप्लाय की जाए, यदि इसमें पूर्ति नहीं होती तो 40 फीसदी निजी तौर पर खरीदने का प्रावधान है। इसमें शासन का दावा रहता है कि 60 फीसदी में किसानों को पर्याप्त खाद मिल जाता है, लेकिन 40 फीसदी निजी सप्लाय में ही दुकानदार मनमानी दरों में किसानों को खाद बेचते हैं। जिसकी सीधी मार किसानों की जेब पर ही पड़ती है। किसानों का कहना है कि हम खाद लेने मार्कफेड जा रहे हैं तो वहां बताया जा रहा है कि अभी खाद नहीं मिलेगी। हर बार हम खाद लेने आते हैं तो इसी तरह की किल्लत तमाम सोसायटियां और वेयर हाउस वाले बता देते हैं। कभी शासन के नियमों में उलझा देते हैं तो कभी शॉर्टेज का तर्क दे देते हैं। ऐसे में किसानों को जरूरत के हिसाब का खाद नहीं मिल पाता। किसानों ने आरोप लगाया कि ऑफ सीजन में उक्त दुकानदार बड़े स्तर पर स्टॉक कर लेते हैं। प्रदेशभर से सैकड़ों बड़े सप्लायर हैं, जिनके यहां जांच हो तो व्यापक स्तर का स्टॉक मिल सकता है। भारतीय किसान संघ के कुमैरसिंह सौंधिया कहते हैं कि हर बार खाद के लिए किसानों को परेशान होना पड़़ता है। खाद के बड़े सप्लायर्स बड़े स्तर पर स्टॉक जमा कर लेते हैं, जिसमें अधिकारी भी शामिल रहते हैं। स्थानीय विस्तार अधिकारी तो सेटिंग करके रखते हैं जो कार्रवाई के लिए तक नहीं पहुंचते।
320 करोड़ का नकली बीज खपाया कंपनियों ने
जानकारों की मानें तो खरीफ सीजन में भी कंपनियों ने नकली खाद-बीज की जमकर कालाबाजारी की गई। देश को कुल उत्पादन का 55 फीसदी सोयाबीन देने वाले मप्र में इस बार अनुमानत: करीब 320 करोड़ का नकली बीज खपाया गया। मप्र में हर साल लगभग 25 लाख क्विंटल सोयाबीन बीज का उत्पादन होता है जिसमें से करीब 15 लाख क्विंटल बीज का इस्तेमाल राज्य में ही होता है। कंपनियां इसका फायदा उठाने के लिए जमकर कालाबाजारी करती हैं। प्रदेश में खरीफ फसलों की बुआई के समय केवल बीज का ही नहीं बल्कि खाद की भी जमकर कालाबाजारी की गई। कई जिलों में तो स्थिति यह रही कि किसानों को जितने खाद की जरूरत है, उससे आधा उर्वरक भी नहीं मिला। इसे देखते हुए कंपनियों ने खुब चांदी काटी। खरीफ फसल में खाद और सोयाबीन बीज की कमी ने प्रदेश में इसके गोरखधंधे को बढ़ा दिया था। आलम यह रहा कि इस दौरान जमकर अमानक खाद और बीज बिके। इसका परिणाम यह हुआ कि कई क्षेत्रों में खेतों में फसल न उगने की शिकायतें भी आई। लेकिन अतिवृष्टि के कारण कंपनियों की कारस्तानी दब गई।
न मुआवजा मिला, न बीमा क्लेम
मध्यप्रदेश में इस मानसून सामान्य से 46 फीसदी अधिक बारिश हुई है। इस वजह से धान को छोडक़र हर फसल पर अतिवर्षा का असर हुआ है। किसान मुआवजा और बीमा राशि मिलने में हो रही देरी की वजह से किसानों के पास अगली फसल लगाने तक के लिए पैसे नहीं है। ऐसे में किसान संगठन आंदोलन की तैयारी कर रहे हैं। कृषि विभाग के अधिकारियों के अनुसार, अगस्त महीने में खेतों में जल जमाव के बाद सोयाबीन और मक्के की फसल खराब होने की सूचना आने लगी थी, जिसके बाद प्रदेश सरकार ने फसलों के सर्वे के आदेश दिए थे। सरकार के आधिकारिक आंकड़ों की माने तो प्रदेश में खरीफ की 149.35 लाख हेक्टेयर फसल में से 60.52 लाख हेक्टेयर फसल को नुकसान हुआ है। इससे लगभग 55.36 लाख किसान प्रभावित हुए हैं। आधी से अधिक खरीफ की फसल चौपट होने के बाद प्रदेश के किसान अब बीमा कंपनी और सरकार की तरफ से मिलने वाले मुआवजे की राह देख रहे हैं। कृषि विभाग के अनुसार सोयाबीन, मूंग, उड़द, अरहर और मक्के की फसल पूरी तरह से चौपट हो गई। सोयाबीन की फसल काटने के बाद उससे आमदनी होती थी जिससे वे गेंहू और चने की फसल लगाते थे, लेकिन इस बार खराब सोयाबीन की फसल हटाने के लिए पैसे खर्च करने पड़ रहे हैं। कई किसानों के पास पैसे न होने की वजह से सोयाबीन की खराब फसल खेतों में अभी भी लगी हुई है और कुछ किसान खेत साफ करने के लिए कर्ज ले रहे हैं। मंडियों में इस समय सोयाबीन की आवक हो जाती थी और ट्रक के ट्रक सोयाबीन मंडियों में खड़े रहते थे, लेकिन इस साल स्थिति बदली हुई है।
केंद्र के भरोसे मध्यप्रदेश सरकार
प्रदेश सरकार के मुताबिक मध्य प्रदेश में बारिश से फसल समेत प्रदेश का इंफ्रास्ट्रक्चर बुरी तरह से प्रभावित हुआ है। प्रदेश की करीब 60 लाख हेक्टेयर फसल तबाह हो चुकी है। बाढ़ और अतिवृष्टि से हुए नुकसान के लिए राज्य सरकार ने केंद्र सरकार से 6621 करोड़ रुपए की राहत राशि मांगी है। लेकिन केंद्र ने अभी राहत राशि नहीं भेजी है। जबकि केंद्रीय दल सर्वे कर चुका है। इस वर्ष देश भर में लगभग 113.3 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में सोयाबीन की बुआई हुई है। इसमें से अकेले मध्यप्रदेश में 55.160 (48 फीसदी) लाख हेक्टेयर क्षेत्र में सोयाबीन की बुआई हुई है। इसके बाद महाराष्ट्र में 39.550 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में सोयाबीन की बुआई हुई है। राजस्थान में भी 10 लाख हेक्टेयर से अधिक सोयाबीन लगाया गया है। यानी कि केवल इन तीनों राज्यों में देश के लगभग 90 फीसदी सोयाबीन की बुआई की गई है। इन तीनों राज्यों में सामान्य से अधिक बारिश होने की वजह से सोयाबीन प्रोसेसर्स एसोसिएशन ने देश में सोयाबीन का उत्पादन 18 फीसदी तक कम होने की आशंका जताई है। हालांकि यह कमी आगे और भी घट सकती है।
प्राइवेट कंपनियां हुई मालामाल!
प्रदेश में किसान का हाल यह है कि वह हर स्तर पर ठगा जा रहा है। खासकर फसलों का बीमा कराकर वह इस कदर फंसा है कि उसकी फसल खराब होने के बाद भी उसे मुआवजा नहीं मिल पा रहा है। प्रदेश के अधिकांश किसानों ने प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना (पीएमएफबीवाई)के तहत अपनी फसलों का बीमा कराया था। लेकिन इंश्योरेंस रेगुलेटरी एंड डेवलपमेंट अथॉरिटी ऑफ इंडिया (आईआरडीएआई) की आई एक रिपोर्ट ने प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना की पोल खोलकर रख दी है। रिपोर्ट के अनुसार, प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना में किसान नहीं बल्कि प्राइवेट कंपनियां लहलहाती फसल काट रही हैं। इस योजना से प्राइवेट कंपनियों को जहां 3000 करोड़ का मुनाफा, वही सरकारी को 4,085 करोड़ का नुकसान हुआ है। गौरतलब है कि किसानों की फसल के संबंध में अनिश्चितताओं को दूर करने के लिए नरेन्द्र मोदी की कैबिनेट ने 13 जनवरी 2016 को प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना को मंजूरी दी थी। जिस जोर-शोर से केंद्र सरकार ने प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना लागू की, उसी रफ्तार से अब इसका के्रज घट रहा है। समय पर बीमा क्लेम नहीं मिलने के कारण किसान अब फसलों का बीमा कराने के कतरा रहे हैं।
11 प्राइवेट बीमा कंपनियों को लाभ
जानकारी के अनुसार, देशभर में जिन किसानों ने वर्ष 2018 में प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना के तहत बीमा कराया था, उन्हें तो कोई लाभ नहीं हुआ, लेकिन फसल बीमा करने वाली 11 प्राइवेट बीमा कंपनियां मार्च 2018 में खत्म होने वाले साल में 3 हजार करोड़ रुपए से ज्यादा के मुनाफा में रहीं। आईआरडीएआई की रिपोर्ट के मुताबिक प्राइवेट बीमा कंपनियों ने फसल बीमा के लिए जो प्रीमियम किसानों से वसूला, वह फसल के नुकसान पर किए गए दावे के मुकाबले कहीं ज्यादा है। किसान आमतौर पर बाढ़, भूकंप या बारिश की कमी या ज्यादती से होने वाले फसल के नुकसान के लिए बीमा दावा करते हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, निजी क्षेत्र की 11 बीमा कंपनियों ने करीब 11,905.89 करोड़ रुपए प्रीमियम के तौर पर किसानों से वसूले, लेकिन इन कंपनियों ने नुकसान के दावे के तौर पर 8,831.78 करोड़ रुपए का ही भुगतान किया। इस तरह निजी बीमा कंपनियों को करीब 3000 करोड़ रुपए का फायदा हुआ।
सरकारी कंपनियों को नुकसान
इसके विपरीत सरकारी कंपनियों ने 4085 करोड़ रुपए का नुकसान दर्ज किया है। सरकारी बीमा कंपनियों ने किसानों से बीमा प्रीमियम के तौर पर 13,411.1 करोड़ रुपए वसूले। इन कंपनियों ने किसानों की फसलों के नुकसान के लिए उन्हें 17,496.64 करोड़ रुपए का भुगतान किया। इस तरह इन कंपनियों को 4085 करोड़ से ज्यादा नुकसान हुआ। गौरतलब है कि केंद्र्र और राज्य सरकारें किसानों के फसल बीमा का 98 प्रतिशत प्रीमियम चुकाती हैं, जबकि किसानों को दो फीसदी देना होता है। सरकारी बीमा कंपनियों के आंकड़ों से पता चलता है कि किसानों के फसल नुकसान की भरपाई के लिए उनसे लिया गया प्रीमियम पर्याप्त नहीं है। पीएसयू कंपनियों में एग्रीकल्चर इंश्योरेंस कंपनी ऑफ इंडिया लिमिटेड को बड़ा नुकसान हुआ। बता दें कि केंद्र और राज्य सरकारें 98 प्रतिशत प्रीमियम चुकाती हैं, जबकि किसान दो प्रतिशत का भुगतान करते हैं। सरकारी इंश्योरेंस कंपनियों के डेटा से पता चलता है कि किसानों द्वारा किए जाने वाले क्लेम की भरपाई के लिए उनके द्वारा वसूला गया प्रीमियम पर्याप्त नहीं है। सिर्फ एग्रीकल्चर इंश्योरेंस कंपनी ऑफ इंडिया लिमिटेड की बात करें तो इसने कुल 7,893 करोड़ रुपए बतौर प्रीमियम वसूले लेकिन उससे करीब 12,339 करोड़ रुपए का क्लेम लिया गया। इंश्योरेंस रेगुलेटरी ऐंड डेवलपमेंट अथॉरिटी ऑफ इंडिया के डेटा में यह बात सामने आई है। उम्मीद की जा रही है कि सरकार के फसल बीमा स्कीम प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना में इंश्योरेंस कंपनियों का मुनाफा बढ़ेगा। ऐसा किसानों द्वारा किए जा रहे क्लेम के मुकाबले उनको होने वाले असल भुगतान के कम होने की वजह से उम्मीद की जा रही है। वहीं, कम क्लेम की वजह से प्राइवेट सेक्टर की कंपनियों के खाते में पहले ही 3,074 करोड़ रुपए का मुनाफा दर्ज किया गया है।
नहीं मिल रहा है क्लेम
मप्र के किसान प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना से छुटकारा चाहते हैं। किसानों को लगता है कि योजना उन्हें लाभ से कहीं अधिक आर्थिक और मानसिक हानि पहुंचा रही है। यही कारण है कि तीन साल पहले योजना लागू होने के साथ ही सरकार द्वारा बिछाए इस जाल से निकलने के लिए वे निरंतर प्रयासरत हैं। प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना, दरअसल, केंद्र सरकार की एक स्कीम है, जिसे प्रदेश सरकारों को किसानों के 'हित' में अपनी सुविधानुसार लागू करना है। कहने को योजना प्राकृतिक आपदा और बीमारी से फसलों की बर्बादी की भरपाई के लिए है। मगर इसमें इतने झोल और पेंच हैं कि योजना लागू होने के बाद से इसके विभिन्न पहलुओं पर निरंतर सवाल उठाए जा रहे हैं। भारतीय किसान यूनियन के गुरूनाम सिंह कहते हैं कि सरकार, बैंक और बीमा कंपनियों के व्यवहार से लगता है कि यह फसल बीमा कम बैंक लोन बीमा ज्यादा है। इस मामले में रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया की बैंक नियमावली की भी अनदेखी की जा रही हैं।
आरबीआई की ओर से बैंकों को स्पष्ट निर्देश है कि किसी भी मामले में ग्राहकों के बैंक खातों से बगैर उनकी अनुमति कोई रकम नहीं निकाली जा सकती। मगर फसलों के लिए किसानों को कर्ज देने वाले बैंक आरबीआई की इस नियामावली की धज्जियां उड़ा रहे हैं। फसली ऋण देने के साथ ही बीमे की किस्त किसानों के खाते से काट ली जाती है। फसल बर्बाद होने पर बीमा की रकम मिलती भी है तो वह किसानों के हाथ में न जाकर सीधा बैंक में जाती है, जिसमें से बैंक अपना दिया हुआ कर्ज काट लेते हैं। यानि बीमा लेने के बाद भी किसानों को फसल बर्बादी पर कोई राहत नहीं मिल रही है। उनके हाथ पहले की तरह ही खाली रहते हैं।
किसान संगठनों का आरोप है कि योजना लागू होने के तीन साल बाद भी स्थिति है कि यदि बीमा कंपनी से संबंधित किसी मसले का निपटरा कोई किसान करना भी चाहे तो नहीं कर सकता। इसकी सुनवाई के लिए सरकार की ओर से आज तक कोई 'ट्रिब्यूनल' गठित नहीं किया गया और न ही कोई 'फोरम' ही स्थापित हुआ है। बीमा कंपनियों के एजेंट के तौर पर कुछ सरकारी विभाग काम कर रहे हैं। फसली ऋण लेने से लेकर, किन्ही कारणों से फसल बर्बाद होने, गिरदावरी कराने और फसल का क्लेम दिलाने में बीमा कंपनी की कोई भूमिका नहीं होती। बीमा कंपनी की जगह हर भूमिका में सरकारी महकमा है। किसान अपनी मर्जी से बीमा कंपनी का चयन भी नहीं कर सकता।